दमोह में स्वास्थ्य विभाग का महा-फर्जीवाड़ा: संजीवनी क्लिनिक में फर्जी MBBS डिग्री पर नौकरी कर रहे 3 कथित 'डॉक्टर' गिरफ्तार; भोपाल-जबलपुर तक जुड़े तार
दमोह। मध्य प्रदेश के दमोह जिले में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की नाक के नीचे चल रहे एक बहुत बड़े और चौंकाने वाले फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ हुआ है। भारत सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत संचालित 'संजीवनी क्लिनिक' में फर्जी एमबीबीएस (MBBS) डिग्री और जाली मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने वाले तीन कथित डॉक्टरों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है।
दमोह के पुलिस अधीक्षक (SP) आनंद कलादगी ने इस संवेदनशील मामले का आधिकारिक खुलासा करते हुए बताया कि आरोपियों की पहचान कुमार सचिन यादव, राजपाल गौर और अजय मौर्य के रूप में हुई है। इस सनसनीखेज खुलासे के बाद प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मच गया है, क्योंकि इसमें राज्य स्तरीय संस्थाओं और भोपाल स्तर के सिंडिकेट की भूमिका भी संदिग्ध नजर आ रही है।
एक अज्ञात फोन कॉल ने खोल दी स्वास्थ्य विभाग की पोल
दमोह के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. राजेश अठया ने बताया कि करीब 10 दिन पहले उनके पास एक अज्ञात व्यक्ति का गोपनीय फोन आया था। फोन करने वाले ने सनसनीखेज दावा किया कि दमोह के संजीवनी क्लिनिक में दो ऐसे डॉक्टर पदस्थ हैं, जिनकी डिग्रियां पूरी तरह से फर्जी हैं।
चूंकि इन डॉक्टरों की सीधी नियुक्ति राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) भोपाल के माध्यम से दमोह के लिए हुई थी, इसलिए स्थानीय स्तर पर इनके दस्तावेजों की पहले गहन जांच नहीं की गई थी। फोन आने के बाद सीएमएचओ ने तत्काल एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी गठित की। जब कमेटी ने दोनों के शैक्षणिक व मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन दस्तावेजों का सत्यापन कराया, तो सारे कागजात पूरी तरह से फर्जी और कूट रचित (Forged) पाए गए। इसके बाद तत्काल कोतवाली थाना पुलिस को लिखित प्रतिवेदन भेजा गया।
दमोह से लेकर जबलपुर तक पुलिस का बड़ा एक्शन
सीएमएचओ कार्यालय से प्रतिवेदन मिलते ही एसपी आनंद कलादगी के निर्देशन में कोतवाली थाना पुलिस ने तत्काल मामला दर्ज कर जाल बिछाया। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए संजीवनी क्लिनिक सुभाष कॉलोनी दमोह में पदस्थ डॉ. कुमार सचिन यादव (मूल निवासी- ग्वालियर) और डॉ. राजपाल गौर (निवासी- काकूखेड़ा, मगरधा, सीहोर) को गिरफ्तार कर लिया। ये दोनों आरोपी पिछले करीब एक साल से सरकारी डॉक्टर बनकर रोजाना सैकड़ों मासूम मरीजों का इलाज कर रहे थे और सरकारी खजाने से वेतन उठा रहे थे।
कोतवाली पुलिस की कड़ाई से की गई पूछताछ में आरोपियों ने एक और बड़े राज से पर्दा उठाया। उन्होंने बताया कि उनका एक अन्य साथी अजय मौर्य (निवासी- अलापुरा जोरा, मुरैना) भी फर्जी दस्तावेजों के सहारे जबलपुर के चेरीताल स्थित संजीवनी अस्पताल में पिछले ढाई साल से 'डॉक्टर' बनकर पदस्थ है। दमोह पुलिस ने तत्काल एक विशेष टीम गठित कर जबलपुर में दबिश दी और तीसरे आरोपी अजय मौर्य को भी हिरासत में ले लिया।
पैसों के बदले बांटी जा रही थीं डिग्रियां, भोपाल की संस्थाएं शक के घेरे में
एसपी आनंद कलादगी ने मामले की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हुए कहा कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर राज्य स्तर की संस्था के माध्यम से सरकारी अस्पतालों में नियुक्तियां कराना एक बेहद गंभीर और संगठित अपराध है। यह सीधे तौर पर आम जनता के स्वास्थ्य और जिंदगी के साथ क्रूर खिलवाड़ है।
प्रारंभिक पूछताछ में यह बात सामने आई है कि इस रैकेट के पीछे एक बहुत बड़ा अंतरराज्यीय गिरोह सक्रिय है, जो मोटी रकम (रिश्वत) लेकर युवाओं को फर्जी एमबीबीएस डिग्री, डॉक्टर रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट और अन्य कूट रचित दस्तावेज उपलब्ध कराता था। इसके बाद भोपाल स्तर की कुछ संदिग्ध संस्थाओं और दलालों के माध्यम से इन्हें एनएचएम के तहत बैकडोर से सरकारी नियुक्तियां दिला दी जाती थीं।
इन गंभीर धाराओं में मामला दर्ज, अभी और खुलेंगे राज
दमोह पुलिस ने तीनों कथित 'मुन्नाभाइयों' और इस रैकेट से जुड़े अज्ञात मददगारों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की गंभीर धाराओं 318(3), 338, 336(3) और 340(2) के तहत अपराध पंजीबद्ध किया है। आरोपियों को न्यायालय में पेश कर रिमांड पर लिया जा रहा है। पुलिस अब इस बात की गहनता से पड़ताल कर रही है कि प्रदेश के अन्य जिलों में इस गिरोह के माध्यम से और कितने फर्जी डॉक्टर सरकारी या निजी अस्पतालों में लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं।
