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8-10 लाख में खरीदी गई थीं MBBS की फर्जी डिग्रियां! पूछताछ में जीवाजी यूनिवर्सिटी ग्वालियर और रीवा मेडिकल कॉलेज का आया नाम; सरगना फरार

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दमोह। मध्य प्रदेश के दमोह जिले के सरकारी आरोग्य केंद्रों (संजीवनी क्लिनिक) में पदस्थ फर्जी डॉक्टरों के मामले में सोमवार को एक और बेहद सनसनीखेज खुलासा हुआ है। पुलिस रिमांड के दौरान आरोपियों से की गई कड़ाई से पूछताछ में सामने आया है कि इन कथित 'मुन्नाभाइयों' ने 8 से 10 लाख रुपये की भारी-भरकम रकम चुकाकर एमबीबीएस (MBBS) की जाली डिग्रियां खरीदी थीं।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन जाली दस्तावेजों पर जीवाजी यूनिवर्सिटी ग्वालियर और रीवा मेडिकल कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के नाम दर्ज हैं। इस खुलासे के बाद पुलिस अधीक्षक (SP) आनंद कलादगी के निर्देशन में जालसाज गिरोह के मुख्य सरगनाओं को दबोचने के लिए पुलिस की विशेष टीमें भोपाल और ग्वालियर के लिए रवाना कर दी गई हैं।

योग्यता बीडीएस और बीएचएमएस, लेकिन नौकरी के लिए दिखाई फर्जी एमबीबीएस डिग्री

पुलिस की गिरफ्त में आए मुख्य आरोपी डॉ. कुमार सचिन यादव (निवासी- ग्वालियर) और डॉ. राजपाल गौर (निवासी- सीहोर) वास्तव में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े तो हैं, लेकिन उनके पास एलोपैथी (MBBS) का कोई वैध अधिकार नहीं था। जांच में सामने आया कि कुमार सचिन यादव के पास असल में बीडीएस (BDS - दंत चिकित्सक) की डिग्री है, जो 5 महीने पहले ही नियुक्त हुआ था। वहीं, राजपाल गौर के पास बीएचएमएस (BHMS - होम्योपैथी) की डिग्री है, जो पिछले 1 साल से यहां सेवाएं दे रहा था।

इन दोनों ने सरकारी नौकरी और मोटी सैलरी हथियाने के उद्देश्य से शिक्षा माफियाओं से संपर्क कर 8-10 लाख रुपये में फर्जी एमबीबीएस डिग्री और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) का कूट रचित रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट बनवाया था। जब स्वास्थ्य विभाग ने एमसीआई की आधिकारिक वेबसाइट पर इनके रजिस्ट्रेशन नंबरों का मिलान किया, तो वे नंबर किसी अन्य डॉक्टरों के नाम पर दर्ज पाए गए।

जबलपुर से तीसरा आरोपी गिरफ्तार, ढाई साल से कर रहा था प्रैक्टिस

डॉ. सचिन यादव की निशानदेही पर पुलिस ने जबलपुर के चेरीताल स्थित संजीवनी अस्पताल में दबिश देकर तीसरे आरोपी डॉ. अजय मौर्य (मूल निवासी- अलापुरा जोरा, मुरैना) को भी अभिरक्षा में ले लिया है। अजय मौर्य भी इसी तर्ज पर फर्जी एमबीबीएस डिग्री के सहारे पिछले ढाई साल से जबलपुर में मरीजों का इलाज कर रहा था और सरकारी सिस्टम को चूना लगा रहा था।

महीने की 80 हजार सैलरी और रोज 40 मरीजों का इलाज

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. राजेश अठया ने बताया कि ये फर्जी डॉक्टर संजीवनी क्लिनिक में हर दिन 30 से 40 मरीजों का इलाज कर रहे थे और इन्हें प्रतिमाह 70 से 80 हजार रुपये वेतन दिया जा रहा था। राहत की बात यह रही कि संजीवनी क्लिनिकों में सिर्फ ओपीडी (OPD) सेवाएं होती हैं और कोई गंभीर या आपातकालीन इलाज नहीं होता, जिसके चलते किसी मरीज को ऐसी हैवी या गलत दवाएं नहीं दी गईं जिससे जान का खतरा पैदा हो।

चूंकि इन दोनों की सीधी नियुक्ति राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) भोपाल के माध्यम से हुई थी, इसलिए सीएमएचओ डॉ. अठया ने भोपाल मुख्यालय को पत्र लिखकर इन दोनों की शासकीय नियुक्तियों को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की अनुशंसा की है।

जिले के सभी डॉक्टरों की डिग्रियों की होगी बारीकी से जांच

इस महा-फर्जीवाड़े के सामने आने के बाद दमोह जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह अलर्ट मोड पर आ गया है। जिले में संचालित कुल 6 संजीवनी क्लिनिकों में से 2 के डॉक्टर फर्जी पाए जाने के बाद अब जिले के सभी डॉक्टरों की डिग्रियों के सत्यापन (Verification) के आदेश जारी कर दिए गए हैं।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जिला अस्पताल में पदस्थ 38 डॉक्टर, एनएचएम के तहत कार्यरत 15 डॉक्टर और विभिन्न ब्लॉकों व सामुदायिक केंद्रों में तैनात करीब 28 डॉक्टरों सहित सभी रेगुलर, एनएचएम और बॉन्ड वाले चिकित्सकों के शैक्षणिक एवं पंजीयन दस्तावेजों की बारीकी से री-चेकिंग की जा रही है, ताकि सिस्टम में छिपे अन्य 'मुन्नाभाइयों' को भी बेनकाब किया जा सके।