मोहन सरकार का बड़ा फैसला, सरकारी नौकरी से हटी 'दो बच्चों की लिमिट', दिग्विजय सिंह का 25 साल पुराना कानून खत्म!
भोपाल। मध्य प्रदेश में सरकारी नौकरी की तैयारी करने वालों और पहले से सरकारी सेवा में मौजूद कर्मचारियों के लिए एक बहुत बड़ी और भौकाली खबर आई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक ऐसा फैसला लिया है, जिसकी मांग सालों से हो रही थी। सरकार ने साफ कर दिया है कि अब सूबे में सरकारी नौकरी पाने या उसमें बने रहने के लिए 'दो बच्चों की अधिकतम सीमा' का कोई रोड़ा नहीं अड़ेगा। मोहन सरकार ने इस 25 साल पुराने कड़े नियम को पूरी तरह से विलोपित यानी खत्म करने का आदेश दे दिया है।
सीधे शब्दों में कहें, तो अगर किसी के दो से ज्यादा बच्चे हैं, तो भी वह मध्य प्रदेश में सरकारी नौकरी के लिए फॉर्म भर सकता है, परीक्षा दे सकता है और नौकरी पा सकता है। इसके लिए मुख्यमंत्री ने सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) को निर्देश जारी कर पुराने नियम के प्रारूप को पोर्टल से तत्काल हटाने और नया नोटिफिकेशन जारी करने को कह दिया है।
पूरी कहानी क्या है? वो मुख्य बातें जो आपको जाननी चाहिए:
- 25 साल पुराना नियम खत्म: साल 2001 में कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार जो नियम लाई थी, उसे डॉ. मोहन यादव की सरकार ने पलट दिया है।
- तीसरे बच्चे पर अपात्रता खत्म: पहले नियम था कि 26 जनवरी 2001 के बाद जिसके भी दो से अधिक जीवित बच्चे होंगे, वो सरकारी नौकरी के लिए 'अपात्र' माना जाएगा। अब यह पाबंदी इतिहास बन गई है।
- अनुशासनात्मक कार्रवाई का डर गायब: पहले सरकारी नौकरी में रहते हुए तीसरा बच्चा होने पर कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई होती थी, जिसे अब पूरी तरह खत्म कर दिया गया है।
- कर्मचारियों की बड़ी जीत: कर्मचारी संगठन लंबे समय से इस नियम की समीक्षा करने और इसे बदलने की गुहार लगा रहे थे, जिसे सरकार ने आखिरकार मान लिया है।
वो नियम, जिससे कांपते थे सरकारी कर्मचारी
कहानी को थोड़ा फ्लैशबैक में लेकर चलते हैं। साल 2001 में जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह हुआ करते थे, तब बढ़ती आबादी पर लगाम लगाने के नाम पर एक नियम लाया गया। मध्य प्रदेश सिविल सेवा (सेवा की सामान्य शर्तें) नियम, 1961 में संशोधन करके एक कट-ऑफ डेट तय की गई—26 जनवरी 2001।
नियम में कहा गया कि इस तारीख के बाद अगर किसी उम्मीदवार की दो से ज्यादा जीवित संतानें हैं, तो उसे सरकारी नौकरी की सीधी भर्ती या विभागीय पदोन्नति के लिए अयोग्य मान लिया जाएगा।
तीसरा बच्चा मतलब 'अनुशासनहीनता'!
यह नियम सिर्फ नौकरी की रेस में शामिल युवाओं तक ही सीमित नहीं था। जो लोग पहले से सरकारी नौकरी में थे, उनके लिए तो यह और भी खतरनाक था। मध्य प्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के तहत अगर किसी मौजूदा सरकारी कर्मचारी के घर तीसरा बच्चा पैदा होता था, तो उसे 'अनुशासनहीनता' की केटेगरी में डाल दिया जाता था। इसका नतीजा यह होता था कि कर्मचारियों पर विभागीय जांच बैठ जाती थी, उनकी सैलरी इंक्रीमेंट रुक जाते थे और कई बार नौकरी पर भी संकट आ जाता था।
मोहन यादव सरकार ने क्यों लिया यह फैसला?
अब सवाल आता है कि अचानक 25 साल बाद इस नियम को बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? खुद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस फैसले के पीछे की वजह साफ की है।
मुख्यमंत्री कार्यालय के मुताबिक, सूबे के कई कर्मचारी संगठन लंबे समय से इस नियम का विरोध कर रहे थे और इसकी समीक्षा की मांग उठा रहे थे। पुराने नियम की वजह से कई योग्य उम्मीदवारों और शासकीय सेवकों के परिवारों को भारी मानसिक और व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा:
"यह प्रावधान काफी पुराना हो चुका था और आज के समय के हिसाब से इसमें बदलाव की सख्त जरूरत थी। शासकीय सेवकों के हितों को ध्यान में रखते हुए हमने इस नियम को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने का निर्णय लिया है। अब दो से अधिक जीवित संतान होने पर सरकारी सेवा में अपात्र माने जाने का प्रावधान पूरी तरह विलोपित होगा और जल्द ही नया प्रारूप सामने आएगा।"
सरकार के इस कदम के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने पोर्टल से पुराने ड्राफ्ट को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है और जल्द ही इस संबंध में नया आधिकारिक गजट नोटिफिकेशन जारी कर दिया जाएगा। मध्य प्रदेश के लाखों युवाओं और कर्मचारियों के लिए यह फैसला किसी बड़े तोहफे से कम नहीं है!
