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दमोह जनसुनवाई: '6 साल में 65 बार आ चुका हूं...' जमीन विवाद से तंग बुजुर्ग ने कलेक्टर के सामने दी आत्मदाह की चेतावनी!

62-year-old Narayan Kurmi presenting his land dispute application to Collector Pratap Narayan Yadav during Jansunwai at Damoh Collectorate

दमोह: "साहब, पिछले 6 साल में 65 से ज्यादा बार आवेदन दे चुका हूं, लेकिन सुनवाई के नाम पर सिर्फ तारीख मिलती है. अगर इस बार भी मेरी जमीन का बंटवारा नहीं हुआ, तो मेरे पास आत्मदाह करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा." यह बेबसी और गुस्सा किसी फिल्मी सीन का नहीं, बल्कि दमोह कलेक्ट्रेट में मंगलवार को लगी जनसुनवाई का है. जहां सिस्टम के चक्कर काट-काटकर थक चुके ढिगसर गांव के एक 62 वर्षीय बुजुर्ग ने अधिकारियों के सामने ही सुसाइड की चेतावनी दे डाली.

6 साल, 65 चक्कर और अब 'करो या मरो' का अल्टीमेटम!

पूरा मामला दमोह के ढिगसर गांव से जुड़ा है. यहाँ रहने वाले नारायण कुर्मी (62) मंगलवार को कलेक्ट्रेट में चल रही जनसुनवाई में पहुंचे और सीधे कलेक्टर प्रताप नारायण यादव को अपना आवेदन सौंप दिया. नारायण का कहना है कि वे सालों से अपने भाई की जमीन के बंटवारे की मांग को लेकर सरकारी दफ्तरों की खाक छान रहे हैं.

बुजुर्ग का धैर्य अब इस कदर जवाब दे चुका है कि उन्होंने साफ लहजे में कह दिया कि यदि इस बार भी अधिकारियों ने उनकी फाइल को आगे नहीं बढ़ाया और समस्या का परमानेंट इलाज नहीं ढूंढा, तो वह कड़ा कदम (आत्मदाह) उठाने पर मजबूर हो जाएंगे.

सरकारी नियम वर्सेज बुजुर्ग की जिद: पेंच कहाँ फंसा है?

बुजुर्ग की यह खौफनाक चेतावनी सुनते ही कलेक्ट्रेट परिसर में हड़कंप मच गया. कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने बिना वक्त गंवाए तत्काल तहसीलदार को पूरे मामले की फाइल खंगालने और एक्शन लेने के निर्देश दिए. अधिकारियों ने नारायण कुर्मी को टेबल पर बिठाकर शांत कराया और सरकारी कायदे-कानून समझाने की कोशिश की.

क्या है असली कानूनी पेंच?

  • मालिक की रजामंदी जरूरी: अधिकारियों ने नारायण को समझाया कि कानूनन किसी भी व्यक्ति की जमीन का बंटवारा उसकी सहमति और आधिकारिक आवेदन के बिना नहीं किया जा सकता.
  • भाई के नाम है जमीन: जिस जमीन के हक के लिए नारायण कुर्मी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, वो असल में उनके भाई के नाम पर दर्ज है. इसलिए नियम के मुताबिक, बंटवारे की कानूनी प्रोसेस शुरू करने के लिए आवेदन भी खुद भूमि स्वामी (यानी उनके भाई) को ही देना होगा.
  • बुजुर्ग अपनी बात पर अड़े: हालांकि, सरकारी नियमों की यह दलील नारायण कुर्मी के गले नहीं उतरी. वे अपनी मांग पर अड़े रहे कि प्रशासन को ही इसका रास्ता निकालना होगा.

अब बुधवार को ऑन-द-स्पॉट फैसला: गांव पहुंचेंगी तहसीलदार पारुल चौधरी

जब कलेक्ट्रेट में बात बनती नहीं दिखी, तो दमोह तहसीलदार पारुल चौधरी ने मोर्चा संभाला और मामले को ऑन-द-स्पॉट सुलझाने का एक सॉलिड प्लान बनाया. उन्होंने नारायण कुर्मी को भरोसा दिया है कि वे खुद बुधवार को ढिगसर गांव पहुंचेंगी.

तहसीलदार ने कहा कि वे गांव जाकर नारायण और उनके भाई रमेश, दोनों पक्षों को आमने-सामने बिठाकर बात सुनेंगी. भाई रमेश की मौजूदगी में पूरे जमीनी फसाद को समझा जाएगा और दोनों पक्षों को सरकारी नियमों का पाठ पढ़ाते हुए बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की जाएगी. अब देखना यह है कि बुधवार को जब प्रशासनिक अमला ढिगसर गांव की चौपाल पर बैठता है, तो इस 6 साल पुराने पारिवारिक और जमीनी विवाद का द एंड होता है या नहीं.