सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश: निजी स्कूलों में 25% सीटें गरीब बच्चों के लिए अनिवार्य; टालमटोल नहीं कर सकेंगे स्कूल
नई दिल्ली। शिक्षा के अधिकार (RTE) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम लगा दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (2009) के तहत निजी स्कूलों को अपनी कुल क्षमता की 25 प्रतिशत सीटों पर समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों को प्रवेश देना न केवल वैधानिक बल्कि संवैधानिक दायित्व भी है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने लखनऊ पब्लिक स्कूल की एक अपील को खारिज करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें बच्चे को तत्काल प्रवेश देने का निर्देश दिया गया था।
शिक्षा का अधिकार एक राष्ट्रीय मिशन
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में शिक्षा के अधिकार को एक 'राष्ट्रीय मिशन' करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत शिक्षा एक मौलिक अधिकार है। यदि आरटीई कानून के निर्देशों को उसकी मूल भावना के साथ अक्षरश: लागू नहीं किया गया, तो यह अधिकार महज एक कोरा वादा बनकर रह जाएगा।
स्कूलों के लिए प्रवेश देना अनिवार्य
अदालत ने स्कूलों को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि एक बार जब राज्य सरकार किसी छात्र का नाम आरटीई के तहत चयनित कर स्कूल को भेज देती है, तो स्कूल बिना किसी देरी के उसे प्रवेश देने के लिए बाध्य है। स्कूलों को सरकार के चयन पर कुछ असहमति हो सकती है और वे संबंधित अधिकारी के समक्ष अपना पक्ष रख सकते हैं, लेकिन उन्हें परिणाम की प्रतीक्षा किए बिना छात्र को प्रवेश देना अनिवार्य है।
जवाबदेही और पारदर्शिता के नियम
प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ निर्देश भी दिए हैं:
- सीटों का प्रकाशन: स्कूलों को उपलब्ध सीटों की जानकारी काफी पहले से सार्वजनिक करनी होगी।
- इनकार का ठोस कारण: यदि किसी मामले में प्रवेश से इनकार किया जाता है, तो स्कूल को इसके विशिष्ट कारण दर्ज करने होंगे।
- समयसीमा में समीक्षा: इन कारणों की समीक्षा शैक्षिक अधिकारियों द्वारा एक निर्धारित समयसीमा के भीतर की जाएगी ताकि जवाबदेही तय हो सके।
सामाजिक एकीकरण और समानता का लक्ष्य
उत्तर प्रदेश के आरटीई नियम 2011 का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि 'पड़ोस के स्कूल' की अवधारणा एक सोची-समझकी वैधानिक परिकल्पना है। इसका उद्देश्य बच्चों के शुरुआती वर्षों के दौरान सामाजिक एकीकरण और दर्जे की समानता को व्यावहारिक रूप देना है। यह कानून न केवल युवा भारत को शिक्षित करने की दिशा में एक कदम है, बल्कि समाज की सामाजिक संरचना में बदलाव लाने का एक ठोस प्रयास भी है।