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दमोह: 'लाडली बहना' के पैसों के विवाद में टूटा था घर; कोर्ट की पहल पर फिर एक हुए पति-पत्नी

Reunited couple Mukesh and Sunita with their children and judges at Damoh Lok Adalat

दमोह। लोगों के आपसी विवादों को सुलझाने और सुलभ न्याय दिलाने के उद्देश्य से आयोजित होने वाली नेशनल लोक अदालतें न केवल फाइलों का बोझ कम कर रही हैं, बल्कि टूटते हुए घरों को जोड़ने का भी माध्यम बन रही हैं। मध्यप्रदेश के दमोह जिले में शनिवार को आयोजित नेशनल लोक अदालत में एक ऐसा ही भावुक कर देने वाला प्रकरण सामने आया, जहाँ महज एक सरकारी योजना की राशि के लेनदेन को लेकर उपजे विवाद के कारण एक परिवार बिखरने की कगार पर पहुँच गया था। जजों और अधिवक्ताओं की सार्थक कोशिशों के बाद 10 साल पुराना यह रिश्ता टूटने से बच गया और दो मासूम बच्चों को फिर से अपने माता-पिता का साथ मिल गया।

बचत और जरूरत के बीच उपजा विवाद

दरअसल, दमोह के पथरिया फाटक रेलवे ब्रिज के पास रहने वाले मुकेश प्रजापति और उनकी पत्नी सुनीता का वैवाहिक जीवन पिछले एक दशक से सामान्य चल रहा था। उनके दो बच्चे भी हैं, लेकिन पिछले तीन वर्षों में 'मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना' ने इस परिवार में खुशियों के बजाय कलह के बीज बो दिए। विवाद की शुरुआत तब हुई जब सुनीता को योजना के तहत मिलने वाली राशि के उपयोग को लेकर पति-पत्नी के विचार अलग हो गए। सुनीता चाहती थी कि वह इन पैसों को बचाकर रखे ताकि भविष्य में बच्चों की पढ़ाई और जरूरतों में काम आ सकें, जबकि मुकेश अपनी बीमारी के इलाज के लिए उन पैसों का उपयोग करना चाहता था।

तलाक की अर्जी और मासूमों का भविष्य

पैसों के हिसाब-किताब और उपयोग को लेकर शुरू हुई यह छोटी सी बहस धीरे-धीरे गंभीर झगड़े में बदल गई। नौबत यहाँ तक आ गई कि दोनों पिछले काफी समय से अलग रह रहे थे और मामला कुटुंब न्यायालय में तलाक की अर्जी तक पहुँच गया। बिछड़ने की इस जिद के बीच सबसे ज्यादा प्रभावित उनके दो मासूम बच्चे हो रहे थे, जिनका बचपन माता-पिता के आपसी मनमुटाव की भेंट चढ़ रहा था।

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लोक अदालत में जजों की मानवीय पहल

लोक अदालत के दौरान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुभाष सोलंकी और कुटुंब न्यायालय के न्यायाधीशों ने इस मामले को गंभीरता से लिया। जजों ने दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं के साथ मिलकर मुकेश और सुनीता की लंबी काउंसलिंग की। उन्हें समझाया गया कि मामूली आर्थिक विवाद के कारण वे अपने बच्चों का भविष्य दांव पर लगा रहे हैं। न्यायाधीशों की मानवीय अपील और बच्चों के प्रति ममता ने अंततः दंपति का दिल पिघला दिया। दोनों ने अपनी गलतियों को स्वीकार करते हुए एक-दूसरे के साथ फिर से घर बसाने का संकल्प लिया।

समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश

जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुभाष सोलंकी ने इस सुखद मिलन पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि वर्तमान समय में छोटी-छोटी बातों पर परिवारों का टूटना समाज के लिए चिंताजनक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि समाज का समझदार तबका और कानून के रखवाले जिम्मेदारी से पहल करें, तो कई परिवारों को उजड़ने से बचाया जा सकता है। लोक अदालत के समापन पर जब यह परिवार मुस्कुराते हुए कोर्ट परिसर से बाहर निकला, तो वहां मौजूद अधिवक्ताओं और पक्षकारों की आँखों में भी खुशी के आंसू थे।