सोयाबीन की पैदावार बढ़ाने का 'क्लाइमेट-स्मार्ट' रोडमैप: दमोह के किसानों के लिए वैज्ञानिक सलाह

climate smart soybean farming techniques in Damoh

दमोह मध्य प्रदेश, जिसे भारत का 'सोया स्टेट' कहा जाता है, आज जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। पिछले एक दशक में दमोह, सागर और सतना जैसे क्षेत्रों में सोयाबीन की पैदावार 1000-1200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर स्थिर हो गई है। मानसून की अनिश्चितता, कभी भारी जलभराव तो कभी सूखे की मार ने किसानों के मुनाफे को प्रभावित किया है। इस संकट से उबरने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने 'क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर' (CSA) को अपनाने का आह्वान किया है।

जलवायु-अनुकूल उन्नत किस्मों का चयन

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, अब पुरानी किस्मों के बजाय जलवायु के प्रति सहनशील बीजों का चुनाव मुनाफे की पहली शर्त है। प्रमुख अनुशंसित किस्में इस प्रकार हैं:

  • उच्च उपज वाली किस्में: NRC 165, JS 22-12 और JS 16 जैसी किस्में आधुनिक कृषि के लिए बेहतरीन हैं, जो कीटों और बीमारियों के प्रति मजबूत प्रतिरोधक क्षमता रखती हैं।
  • सूखा और नमी सहनशील किस्में: विषम मौसम में भी स्थिर पैदावार के लिए NRC 131, NRC 136 और NRC 157 का उपयोग करना चाहिए।
  • विशेषताएं: इन किस्मों की पैदावार क्षमता 20 से 31 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है, जो बदलते मौसम के अनुकूल विकसित की गई हैं।

ब्रॉड बेड फ़रो (BBF) तकनीक


खेती की आधुनिक तकनीकें

दमोह की काली मिट्टी (वर्टिसॉल) में जल निकासी और नमी संरक्षण के लिए वैज्ञानिकों ने ब्रॉड बेड फ़रो (BBF) तकनीक को रामबाण बताया है।

  • BBF का लाभ: यह तकनीक खेत से अतिरिक्त पानी को नालियों के माध्यम से बाहर निकाल देती है, जबकि सूखे के दौरान यही नालियां नमी को संरक्षित कर पौधों तक पहुँचाती हैं।
  • बीजोपचार (FIR प्रोटोकॉल): बुवाई से पहले बीजों को फफूँदनाशी (F), कीटनाशक (I) और राइज़ोबियम/PSB कल्चर (R) से उपचारित करना फसल को शुरुआती कीटों और बीमारियों से बचाता है।


जल और पोषण प्रबंधन

सोयाबीन में फलियां भरते समय (बुवाई के 65-85 दिन बाद) नमी की कमी पैदावार में 40% तक की भारी गिरावट ला सकती है।

  • जीवन रक्षक सिंचाई: खेत में छोटे तालाब (20*15 फीट) बनाकर वर्षा का जल संचय करें और फलियां भरते समय स्प्रिंकलर से सिंचाई करें।
  • सल्फर का महत्व: मिट्टी में जिंक, नाइट्रोजन और विशेष रूप से सल्फर (जिप्सम के रूप में, 20-25 किलो/हेक्टेयर) का प्रयोग तिलहन में तेल और प्रोटीन की मात्रा को बढ़ाता है।


एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM)

महंगे रसायनों पर निर्भरता कम करने के लिए वैज्ञानिकों ने निम्न उपाय सुझाए हैं:

  • मई में गहरी जुताई ताकि कीटों के प्यूपा नष्ट हो सकें।
  • फेरोमॉन ट्रैप (10-12 प्रति हेक्टेयर) और पक्षियों के लिए 'T' आकार की लकड़ियों का उपयोग।

भविष्य की राह

दमोह के किसानों के लिए आधुनिक 'कस्टम हायरिंग सेंटर' का विस्तार, कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से तकनीकी प्रशिक्षण और कम कार्बन उत्सर्जन वाली फसलों के लिए प्रीमियम बाजार स्थापित करना अब एक जरूरत बन गया है। इन तकनीकों को अपनाकर किसान न केवल अपनी फसल को मौसम की मार से बचा सकते हैं, बल्कि भविष्य के लिए खेती को लाभदायक और पर्यावरण के अनुकूल भी बना सकते हैं।

लेखक: डॉ. मनोज कुमार अहिरवार (केवीके, दमोह), रविंद्र डोहले (आरवीएसकेवीवी, ग्वालियर), डॉ. द्वारका (पन्ना) और डेनिश अहिरवार (आरवीएसकेवीवी, ग्वालियर)।